पटना, बिहारस्केन डेस्क। देश की आधी आबादी और गरीब परिवारों को धुएं से आजादी दिलाने के नाम पर शुरू हुई ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (Ujjwala LPG Cylinder Quota) को लेकर केंद्र सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने वाला है। सरकार ने इस योजना के तहत मिलने वाले सालाना सब्सिडी वाले सिलेंडरों के कोटे में भारी कटौती कर दी है। अब लाभार्थियों को साल में 9 की जगह सिर्फ 4 एलपीजी (LPG) सिलेंडर ही सब्सिडी के साथ मिलेंगे।
बिहार जैसे राज्य के लिए, जहां की एक बड़ी आबादी आज भी इसी सरकारी राहत के भरोसे लकड़ी और कोयले को छोड़कर गैस चूल्हे पर शिफ्ट हुई थी, यह फैसला किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
देखिए देश और बिहार में एलपीजी संकट की एक झलक
नीचे दी गई तस्वीर में आप एलपीजी सिलेंडरों की कतार देख सकते हैं, जो आज के समय में हर आम और गरीब परिवार की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।
बिहार के संदर्भ में समझिए: चूल्हे की तरफ लौटने को मजबूर होगी ग्रामीण आबादी?
बिहारस्केन की टीम ने जब इस फैसले के जमीनी असर को समझने की कोशिश की, तो कई चौंकाने वाले पहलू सामने आए। बिहार में उज्ज्वला योजना के करोड़ों लाभार्थी हैं। उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों से लेकर दक्षिण बिहार के ग्रामीण अंचलों तक, इस योजना ने महिलाओं की जिंदगी बदली थी।
बिहार का जमीनी सच: बिहार के गांवों में औसतन एक संयुक्त या बड़े परिवार में साल भर में कम से कम 7 से 8 सिलेंडरों की खपत आराम से हो जाती है। सरकार का तर्क है कि औसत घरेलू खपत 4 सिलेंडर ही है, लेकिन बिहार के ग्रामीण परिवेश में जहां परिवारों का आकार बड़ा होता है, वहां 4 सिलेंडर 6 महीने भी नहीं चलेंगे। ऐसे में Ujjwala LPG Cylinder कोटा घटने से परिवार को फिर से वैकल्पिक ईंधनों पर विचार करना पड़ सकता है।
नतीजतन, कोटा खत्म होने के बाद जब गरीब परिवारों को बिना सब्सिडी के (1022.5 रुपये की मौजूदा कीमत पर) सिलेंडर खरीदना पड़ेगा, तो उनके लिए बजट संभालना नामुमकिन हो जाएगा। ऐसे में इस बात का बड़ा डर है कि बिहार की ग्रामीण महिलाएं फिर से गोइठा (उपले) और लकड़ी के पारंपरिक चूल्हे की तरफ लौटने को मजबूर न हो जाएं।
12 से घटकर 4 पर आया कोटा: कैसे कम होती गई राहत
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी प्रवीण मल खनूजा के मुताबिक, बढ़ती कीमतों और सब्सिडी के बढ़ते बोझ को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। Ujjwala LPG Cylinder Quota के इतिहास पर नजर डालें तो राहत लगातार सिकुड़ती गई है:
- मई 2016 (शुरुआत): हर साल 14.2 किलोग्राम वाले 12 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलते थे।
- पिछले साल: इस कोटे को घटाकर 9 सिलेंडर कर दिया गया।
- अब (जून 2026): कोटे को और बेरहमी से घटाकर मात्र 4 सिलेंडर कर दिया गया है।
महंगाई की मार: दिल्ली से पटना तक बढ़ी कीमतें
Ujjwala LPG Cylinder Quota में कटौती ऐसे समय में की गई है जब एलपीजी की कीमतें पहले से ही आसमान छू रही हैं। पिछले तीन महीनों में कीमतों में दो बार बढ़ोतरी के साथ कुल 89 रुपये का इजाफा हो चुका है। 7 जून को ही कीमतों में 29 रुपये प्रति सिलेंडर की ताजा बढ़ोतरी हुई है।
इस समय बिहार में सिलेंडर की रिटेल कीमत 1022.5 रुपये है। Ujjwala LPG Cylinder Quota लाभार्थियों को 300 रुपये की सब्सिडी मिलती है, जिससे उन्हें यह 722 रुपये का पड़ता है। लेकिन साल में जैसे ही 4 सिलेंडर खत्म होंगे, पांचवें सिलेंडर के लिए उन्हें सीधे 1022.5 रुपये (और बिहार में लॉजिस्टिक्स खर्च जोड़कर करीब 1100 रुपये) ढीले करने होंगे।
एक नजर में समझें पूरा खेल: क्या कहती है सरकार और क्या है हकीकत?
सरकारी तर्क (Official Stance) और जमीनी हकीकत (बिहार का परिप्रेक्ष्य) में जमीन-आसमान का फर्क है सिलेंडर कोटा(Ujjwala LPG Cylinder Quota) सालाना 4 सिलेंडर औसत खपत के लिए काफी हैं।बिहार के बड़े परिवारों में 4 सिलेंडर 5-6 महीने में ही खत्म हो जाएंगे।कीमतों में वृद्धि मिडिल ईस्ट संकट के कारण ग्लोबल सप्लाई लागत ₹1600 पार है, भारत में कीमतें फिर भी कम हैं।अंतरराष्ट्रीय कारणों का हवाला देकर गरीब की थाली को महंगा किया जा रहा है।दैनिक बोझ2 9 रुपये की बढ़ोतरी यानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन सिर्फ 20 पैसे का बोझ। महीने के बजट में एकमुश्त ₹30-₹50 की बढ़ोतरी भी गरीब परिवार का संतुलन बिगाड़ देती है।
बिहारस्कैन का नजरिया: राहत के नाम पर सिर्फ औपचारिकता?
सरकार भले ही यह कह रही है कि 2022 से अब तक उसने एलपीजी सब्सिडी के तौर पर 52,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं और सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (CP) में 46% की बढ़ोतरी के बावजूद वह राहत दे रही है। लेकिन इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) के तनाव की कीमत देश के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को चुकानी पड़ रही है। बिहार जैसे विकासशील राज्य में जहां प्रति व्यक्ति आय पहले ही कम है, वहां इस तरह की कटौती सीधे तौर पर कुपोषण और अस्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देगी।