बिहार में जमीन के कागजात दुरुस्त करने के लिए शुरू किया गया सरकारी ‘राजस्व महा-अभियान’ कागजों पर ही दम तोड़ता नजर आ रहा है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की हालिया समीक्षा बैठक के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। उत्तर बिहार में मात्र 2.5% और दक्षिण बिहार में केवल 4% भूमि सुधार ही हो सका है। 31 अक्टूबर को समाप्त हुए इस महत्वाकांक्षी अभियान की सुस्त रफ्तार ने राज्य के करोड़ों रैयतों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
उत्तर और दक्षिण बिहार का हाल बेहाल
उत्तर बिहार के 21 जिलों में 2.54 करोड़ वैध जमाबंदियों में से 1.68 करोड़ त्रुटियों को सुधारने का लक्ष्य रखा गया था। इसके विपरीत, महज 4.31 लाख (यानी सिर्फ 2.56%) मामलों का ही निपटारा हो सका। आज भी 97.4% गलतियां जस की तस लटकी हुई हैं। बेतिया, बगहा और मोतिहारी जैसे जिलों में तो सुधार की रफ्तार 0.2% से भी नीचे दर्ज की गई।
दक्षिण बिहार के 19 जिलों का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा। यहां 79.28 लाख त्रुटियों में से केवल 3.81% मामलों का ही सुधार हो पाया और 76 लाख से अधिक फाइलें धूल फांक रही हैं।
क्यों फेल हुआ राजस्व महा-अभियान?
- प्रशासनिक बदइंतजामी: बिना किसी ठोस जमीनी तैयारी के अधिकारियों ने भारी-भरकम लक्ष्य तय कर दिए।
- हड़ताल और छुट्टियां: अंचल स्तर पर राजस्व कर्मचारियों और अधिकारियों का सामूहिक अवकाश और हड़ताल पर जाना इस विफलता का मुख्य कारण बना।
- जवाबदेही की कमी: मैदानी स्तर पर काम कर रहे कर्मियों की कोई जवाबदेही तय नहीं की गई।
- गंभीर कमियां बरकरार: ‘जीरो खाता’ और ‘मिसिंग रकबा’ जैसी गंभीर कमियां, जिनकी वजह से राज्य में 90% जमीन विवाद पैदा होते हैं, उन पर सुधार की रफ्तार महज 2% के आसपास सिमट कर रह गई।
बहरहाल, राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दिलीप जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि हड़ताल के चलते जो अभियान बाधित हुआ था, उसे अब आगे और सख्ती से पूरा किया जाएगा ताकि आम जनता को राहत मिल सके।