“सर… सर… आप हमसे बात करिए, हमको आपसे बात करनी है। हमारी बात सुनिए…”
यह किसी आम जनता या फरियादी की आवाज नहीं थी। यह बेबसी भरी पुकार जनता दल यूनाइटेड (JDU) के ही एक कर्मठ और जमीनी नेता की थी। मौका था जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के पटना स्थित आवास का, जहां पार्टी के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार पहुंचे थे।
नीतीश कुमार को देखते ही कार्यकर्ताओं ने जोश में नारेबाजी तो शुरू कर दी, लेकिन इसी बीच जब इस नेता ने अपने ‘सर्वमान्य नेता’ से सीधे बात करने की गुहार लगाई, तो वहां अचानक सन्नाटा पसर गया। हर कोई हैरान होकर उस नेता को देखने लगा।

लेकिन नतीजा वही रहा, जिसकी उम्मीद शायद खुद उस नेता को भी नहीं रही होगी। नीतीश कुमार ने रुककर उसकी बात सुनने के बजाय पास खड़े संजय झा की तरफ इशारा किया और कहा— “इनकी बात सुन लीजिए।” और खुद आगे बढ़ गए।
कार्यकर्ताओं से टूटा सीधा संवाद: JDU के अंदर सुलगती चिंगारी
यह घटना महज एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह आज की तारीख में जेडीयू के भीतर की उस कड़वी हकीकत को बयां करती है जिसे भांपने में लीडरशिप शायद चूक रही है। पार्टी के अंदर आज सबसे बड़ा संकट यही है कि नीतीश कुमार ने अपने ही जमीनी कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं से सीधे मिलना और बात करना लगभग बंद कर दिया है।
राजनीति का सीधा नियम है— जब शीर्ष नेता और जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता के बीच ‘दलाल’ या ‘दरबारी’ हावी होने लगते हैं, तो संगठन खोखला होने लगता है। जेडीयू में आज यही ‘दरबारी संस्कृति’ हावी होती दिख रही है।
“जिससे शिकायत है, दुखड़ा भी उसी को सुनाएं क्या?”
नीतीश कुमार से सीधे न मिल पाने का दर्द अब जेडीयू के भीतर एक दबी हुई बगावत का रूप ले रहा है। कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरी निराशा है कि वे अपनी बात रखें तो कहां रखें?
नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:
- “हमें अपनी बात रखने के लिए उन्हीं बड़े नेताओं के दरबार में जाना पड़ता है, जिनसे हमें शिकायत है।”
- “अगर कोई अधिकारी हमारी बात नहीं सुन रहा या कोई स्थानीय मुद्दा है, तो हम उनके सामने कैसे कहें जो खुद उसी सिस्टम का हिस्सा हैं?”
- “वहां से हमें वो भरोसा और समाधान नहीं मिलता, जो नीतीश बाबू से सीधे मिलकर मिलता था।”
आज जेडीयू का एक बड़ा धड़ा इस असमंजस में है कि सत्ता और संगठन के इस खेल में आखिर उनकी सुनने वाला कौन है? सीधे संवाद के इस अभाव (Communication Gap) के कारण जमीनी स्तर पर पार्टी कमजोर हो रही है।
जेडीयू के लिए खतरे की घंटी: क्यों भारी पड़ सकती है यह बेरुखी?
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके विधायक या सांसद नहीं, बल्कि वो कार्यकर्ता होते हैं जो चिलचिलाती धूप में पार्टी का झंडा लेकर चलते हैं। अगर समय रहते इन कार्यकर्ताओं को मान-सम्मान और उनकी समस्याओं का हल नहीं मिला, तो वे खामोश हो जाते हैं या फिर दूसरा रास्ता चुन लेते हैं।
बिहार की राजनीति जिस दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है, वहां सांगठनिक असंतोष को हल्के में लेना जेडीयू के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। अगर नीतीश कुमार ने कार्यकर्ताओं के साथ इस दूरी को जल्द ही कम नहीं किया, तो यह अंदरूनी मायूसी आने वाले चुनावों में जेडीयू के समीकरण बिगाड़ सकती है।