शिक्षा डेस्क, बिहारस्कैन: तकनीक का इस्तेमाल जब बिना तैयारी के किया जाता है, तो वह सहूलियत नहीं बल्कि आफत बन जाती है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का नया ‘CBSE OSM Evaluation’ यानी OSM सिस्टम इस वक्त कुछ इसी तरह के गंभीर आरोपों और विवादों के घेरे में है। जो सिस्टम इंसानी गलतियों को खत्म करने और मूल्यांकन को पारदर्शी बनाने के दावे के साथ लाया गया था, आज उसी ने लाखों छात्र-छात्राओं की रातों की नींद उड़ा दी है।
बिहारस्कैन की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कि कैसे डिजिटल चेकिंग के इस नए प्रयोग ने बोर्ड की साख पर बट्टा लगा दिया है और कैसे इंटरनेट पर सक्रिय तीन होनहार लड़कों ने सीबीएसई के बड़े-बड़े तकनीकी दावों की हवा निकाल दी।
इन 3 जांबाज टीनएजर्स ने किया सिस्टम को एक्सपोज
इस पूरे CBSE OSM Evaluation Controversy 2026 को मुख्यधारा में लाने का श्रेय किसी बड़ी जांच एजेंसी को नहीं, बल्कि तीन सजग छात्रों की जिद को जाता है:
निसर्ग अधिकारी: 19 साल के इस एथिकल हैकर और छात्र ने तो सीधे सीबीएसई के सुरक्षा तंत्र को ही चुनौती दे डाली। उसने दावा किया कि वह इस ओएसएम पोर्टल को आसानी से हैक कर किसी भी छात्र का नंबर बदल सकता था। पहले तो बोर्ड ने इसे नकारने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार रविवार को आधिकारिक बयान जारी कर माना कि सिस्टम में सुरक्षा कमियां (Vulnerabilities) थीं, जिन्हें अब आईआईटी (IIT) के विशेषज्ञों की मदद से ठीक किया गया है।
वेदांत श्रीवास्तव: 12वीं के इस छात्र को जब फिजिक्स में बेहद कम नंबर मिले, तो उसने हिम्मत दिखाकर अपनी आंसर शीट की डिजिटल कॉपी निकलवाई। जब स्क्रीन पर कॉपी आई तो वह दंग रह गया—हैंडराइटिंग उसकी थी ही नहीं! तकनीक के इस भयंकर ‘ग्लिच’ को उसने सोशल मीडिया पर डाला, जिसके बाद सीबीएसई को खुद आगे आकर मानना पड़ा कि ‘गलती से’ दूसरी कॉपी अपलोड हो गई थी।
सार्थक सिद्धांत: 17 साल के इस लड़के ने एक लंबा खोजी ब्लॉग लिखकर उस हैदराबाद की वेंडर कंपनी (Coempt EduTeck) की पोल खोल दी, जिसे इस डिजिटल मूल्यांकन का ठेका मिला था। सार्थक के इस खुलासे की गूंज राजनीतिक गलियारों तक पहुंची और खुद विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस ‘निडर जेन-जी’ (Gen-Z) छात्र की पीठ थपथपाई।
क्या हैं छात्रों के आरोप और क्या कहते हैं आंकड़े?
मई के महीने में जब सीबीएसई के नतीजे आए, तो पिछले 7 सालों में सबसे कम पास प्रतिशत दर्ज किया गया। इसके बाद जब छात्रों ने री-इवैल्युएशन (पुनर्मूल्यांकन) पोर्टल का रुख किया, तो डिजिटल कॉपियों की कड़वी सच्चाई सामने आई।
- धुंधली और अधूरी स्कैनिंग: छात्रों का आरोप है कि जो कॉपियां स्क्रीन पर चेक करने के लिए अपलोड की गईं, उनके कई पेज या तो कटे हुए थे या इतने धुंधले थे कि कुछ पढ़ा ही नहीं जा सकता था।
- पेज गायब होना: कई कॉपियों में तो छात्रों के लिखे हुए पूरे-पूरे पेज ही स्कैन होने से छूट गए, जिसके चलते उन प्रश्नों के नंबर ही नहीं जुड़े।
- टीचरों की लापरवाही: कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार घंटों बैठकर लंबी थ्योरी वाली कॉपियां जांचना शिक्षकों के लिए भी सिरदर्द साबित हुआ। कई जगह बिना चेक किए ही उत्तर छोड़ दिए गए।
सीबीएसई के अपने अंदरूनी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि गड़बड़ी बड़े स्तर पर थी। कुल जांची गई कॉपियों में से 68,018 कॉपियों को खराब स्कैनिंग के कारण दोबारा स्कैन करना पड़ा, जबकि 13,583 कॉपियों की स्कैनिंग पूरी तरह फेल हो जाने के कारण उन्हें हाथ से (Manual) चेक करना पड़ा।
स्कूलों पर दबाव और री-इवैल्युएशन पोर्टल में देरी
विवाद केवल यहीं नहीं थमा है। सोशल मीडिया (Reddit और X) पर ऐसी भी खबरें तैर रही हैं कि कुछ केंद्रीय विद्यालयों और नामचीन प्राइवेट स्कूलों के प्रिंसिपल्स पर बोर्ड की तरफ से मौखिक दबाव बनाया जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि वे अपने छात्रों से सोशल मीडिया पर इस ओएसएम सिस्टम के पक्ष में वीडियो और पोस्ट डलवाएं, ताकि बोर्ड की गिरती छवि को बचाया जा सके।
बिहारस्कैन का नजरिया: लगातार बढ़ते चौतरफा दबाव के बाद सीबीएसई ने फिलहाल उस वेंडर कंपनी का पेमेंट रोक दिया है। इसके साथ ही, गड़बड़ियों को दुरुस्त करने के लिए जो री-इवैल्युएशन पोर्टल 29 मई को खुलना था, उसकी तारीख बढ़ाकर 1 जून 2026 की गई, ताकि छात्र बिना किसी तकनीकी बाधा के अपनी आपत्ति दर्ज करा सकें।
डिजिटल होना समय की मांग है, लेकिन जब देश के करोड़ों बच्चों के करियर का सवाल हो, तो आधी-अधूरी तैयारी के साथ किए गए प्रयोग ‘ब्लंडर’ बन जाते हैं। बोर्ड ने भले ही अब सुधारात्मक कदम उठाए हों, लेकिन इस मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहे छात्रों और उनके अभिभावकों के भरोसे की भरपाई कैसे होगी, यह एक बड़ा सवाल है।