जानिए 177 देशों ने भारत का साथ क्यों दिया | पर्दे के पीछे की पूरी ‘इनसाइड स्टोरी’
बिहारस्कैन विशेष डेस्क: “इतिहास में पहली बार भारत के किसी सांस्कृतिक प्रस्ताव को इतनी बड़ी वैश्विक स्वीकृति मिली।” आज जब हम हर साल 21 जून को पूरी दुनिया में योग का जश्न मनाते हैं, तो यह केवल एक स्वास्थ्य अभियान जैसा लगता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दुनिया में दो देश एक छोटी सी जमीन के टुकड़े या व्यापारिक समझौते पर सहमत नहीं हो पाते, वहां International Yoga Day के नाम पर पूरी दुनिया (अमेरिका से लेकर चीन और इस्लामिक देशों तक) एक साथ कैसे खड़ी हो गई?
बिहारस्कैन के नजरिए से देखें तो यह भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) और सांस्कृतिक कूटनीति की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत थी। संयुक्त राष्ट्र (UN) के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी देश के प्रस्ताव को इतनी जल्दी और इतने प्रचंड बहुमत से पास किया गया हो। आइए आज इतिहास के उन पन्नों को पलटते हैं और समझते हैं कि संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में कैसे रची गई थी International Yoga Day की यह पटकथा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो ऐतिहासिक प्रस्ताव (27 सितंबर 2014)
कहानी की शुरुआत होती है साल 2014 से। केंद्र में नई-नई सरकार बनी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 69वें सत्र को संबोधित करने न्यूयॉर्क पहुंचे थे। 27 सितंबर 2014 का वो दिन था। अमूमन UN के मंच पर दुनिया भर के नेता आतंकवाद, गरीबी, युद्ध और अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक ऐसा दांव चला, जिसने दुनिया के बड़े-बड़े कूटनीतिज्ञों को हैरान कर दिया।
उन्होंने अपने भाषण में कहा:
“योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि अपने आप से, दुनिया से और प्रकृति से जुड़ने का एक तरीका है। यह हमारे भीतर एकता की भावना को जगाता है। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और तनाव से जूझ रही है, तब योग हमारी जीवनशैली बदलकर एक समाधान दे सकता है। आइए हम सब मिलकर ‘International Yoga Day’ को अपनाने की दिशा में काम करें।”
यह कोई साधारण अपील नहीं थी। इसमें योग को केवल बीमारियों को दूर करने वाले ‘कसरत’ के रूप में पेश नहीं किया गया था, बल्कि इसे ग्लोबल वार्मिंग, मानसिक शांति और विश्व बंधुत्व के एक ‘ब्रह्मास्त्र’ के रूप में दुनिया के सामने रखा गया।
11 दिसंबर 2014: जब UN ने तोड़ दिए अपने ही सारे रिकॉर्ड
UN में किसी भी नए दिवस (International Day) को घोषित करने की प्रक्रिया बेहद लंबी और उबाऊ होती है। महीनों तक कमेटियों में बहस होती है, कई देश वीटो (Veto) लगाते हैं और आपत्तियां दर्ज कराते हैं। लेकिन International Yoga Day के मामले में जो हुआ, वह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा अजूबा था।
27 सितंबर को प्रस्ताव रखा गया और 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से पास कर दिया। यानी मात्र 75 दिनों के भीतर! संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में आज तक कोई भी प्रस्ताव इतने कम समय में लागू नहीं हुआ था।
- UNGA के अध्यक्ष का बयान: उस समय संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष सैम कुटेसा ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि इस प्रस्ताव को जिस अभूतपूर्व तरीके से समर्थन मिला है, वह योग की उस वैश्विक अपील को दर्शाता है, जो सरहदों से परे है।
177 देशों का समर्थन: आखिर दुनिया ने भारत का साथ क्यों दिया?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 177 देश एक साथ कैसे आ गए? संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 सदस्य देश हैं। जब भारत ने यह प्रस्ताव पेश किया, तो 177 देश इसके ‘को-स्पॉन्सर’ (सह-प्रायोजक) बन गए।
इस कूटनीतिक जीत की अहमियत को ऐसे समझिए:
- इस्लामिक देशों का साथ: पाकिस्तान और कुछ गिने-चुने देशों को छोड़ दें, तो सऊदी अरब, यूएई, ईरान, और अफगानिस्तान जैसे दर्जनों इस्लामिक देशों ने इसका खुलकर समर्थन किया। उन्होंने समझा कि योग कोई धार्मिक कर्मकांड (Hindu Ritual) नहीं है, बल्कि यह एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य विज्ञान है।
- पश्चिमी देशों की दीवानगी: अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के देशों में योग पहले से ही मशहूर था। हॉलीवुड सेलेब्रिटीज से लेकर सिलिकॉन वैली के सीईओ तक योग को अपना चुके थे। ऐसे में इन देशों के लिए इस प्रस्ताव का विरोध करने का कोई कारण ही नहीं था।
- चीन और रूस भी आए साथ: भू-राजनीतिक (Geopolitical) मोर्चे पर भारत के प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले चीन और महाशक्ति रूस ने भी इस सांस्कृतिक प्रस्ताव पर भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाया।
यह भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का ऐसा जादू था, जिसने दुनिया को बता दिया कि भारत हथियार या पैसे के दम पर नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और दर्शन के दम पर विश्वगुरु बनने की क्षमता रखता है।
21 जून का ही दिन क्यों चुना गया? (21 जून का विज्ञान और रहस्य)
जब बात आई कि International Yoga Day किस तारीख को मनाया जाए, तो भारत की तरफ से ’21 जून’ की तारीख सुझाई गई। इसके पीछे भी एक बेहद गहरा खगोलीय और आध्यात्मिक विज्ञान छिपा था।
| कारण | 21 जून की खासियत |
| खगोलीय महत्व (Astronomical) | 21 जून उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में साल का सबसे लंबा दिन होता है। इसे ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solstice) कहते हैं। इस दिन सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर सबसे ज्यादा समय तक रहती है। |
| भौगोलिक महत्व (Geographical) | दुनिया के ज्यादातर हिस्से उत्तरी गोलार्ध में ही आते हैं, इसलिए इस दिन का वैश्विक महत्व है। यह दिन प्रकाश, जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है। |
| आध्यात्मिक महत्व (Spiritual) | भारतीय परंपरा के अनुसार, इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन में प्रवेश करता है। कहा जाता है कि इसी संक्रांति के दिन भगवान शिव (आदियोगी) ने अपने पहले सात शिष्यों (सप्तर्षियों) को योग का ज्ञान देना शुरू किया था। |
प्राचीन भारत से आधुनिक विश्व तक: योग की यह यात्रा कैसी रही?
योग कोई रातों-रात पैदा हुआ कॉन्सेप्ट नहीं है। International Yoga Day के इस वैश्विक जश्न के पीछे भारत के हजारों सालों के तप और साधना की कहानी है:
- शुरुआत: सिंधु घाटी सभ्यता में मिली पशुपतिनाथ की मुहरों से पता चलता है कि योग आज से 5000 साल पहले भी अस्तित्व में था।
- शास्त्रों का रूप: महर्षि पतंजलि ने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में ‘योग सूत्र’ की रचना की और अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) के जरिए इसे एक विज्ञान का रूप दिया।
- विश्व तक कैसे पहुंचा? 1893 में जब स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया, तब पश्चिमी दुनिया ने पहली बार योग और भारतीय दर्शन की ताकत को समझा। उसके बाद बी.के.एस. आयंगर और परमहंस योगानंद जैसे गुरुओं ने इसे दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाया।
आज जब न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर, पेरिस के एफिल टॉवर और लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर पर हजारों लोग एक साथ योगा मैट बिछाकर अनुलोम-विलोम करते हैं, तो वह इसी हजारों साल पुरानी यात्रा का चरम बिंदु होता है।
बिहारस्कैन एडिटर टेक: योग अब केवल भारत का नहीं, पूरी इंसानियत का है
संपादकीय नजरिए से अगर हम 2014 से लेकर आज तक के International Yoga Day के सफर का मूल्यांकन करें, तो एक बात बिल्कुल साफ है— योग ने भारत को वैश्विक कूटनीति में एक नया और सम्मानजनक मुकाम दिलाया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग डिप्रेशन, एंग्जायटी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों (जैसे डायबिटीज, बीपी) के शिकार हो रहे हैं, तब दुनिया को यह समझ आ गया है कि एलोपैथी के पास बीमारी का इलाज तो है, लेकिन स्वस्थ रहने की चाबी सिर्फ ‘योग’ के पास है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के जरिए ‘योग’ को दुनिया के नाम पेटेंट नहीं कराया, बल्कि इसे एक खुले स्रोत (Open Source) के रूप में पूरी इंसानियत को सौंप दिया। यही तो हमारे उपनिषदों का मूल मंत्र है— “वसुधैव कुटुंबकम्” (पूरी दुनिया एक परिवार है)।
क्या आपने कभी सोचा था कि हमारे देश की एक प्राचीन विद्या एक दिन दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंच (UN) पर इस तरह छा जाएगी? आपका योग के साथ कैसा अनुभव रहा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।
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Bahut hi uttam jaankari mila.
“Yog sirf ek exercise nahi, balki jeene ka tarika hai. Bahut badhiya post! 👌”
Good Job 🙏🙏
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