पटना। बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इस वक्त एक नया विवाद (Bihar Education System Controversy) गरमा गया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की कमान अब सिर्फ रसूखदारों के परिवारों के हाथ में होगी? उच्च शिक्षा विभाग में हाल ही में हुए कुछ तबादलों और नियुक्तियों ने एक बार फिर ‘भाई-भतीजावाद’ और ‘पावर गेम’ की चर्चा को हवा दे दी है।
चर्चा है कि बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की पत्नी डॉ. रत्ना अमृत को पटना के प्रतिष्ठित ए.एन. कॉलेज (AN College) का नया प्रिंसिपल बनाया जा रहा है। वहीं, एक रिटायर्ड जज की पत्नी के हाथों में कॉलेज ऑफ कॉमर्स की कमान सौंपने की तैयारी है। खेल यहीं खत्म नहीं होता; सत्ता के करीबियों, नेताओं और पत्रकारों के रिश्तेदारों की कतार लंबी है।
जब ‘कुर्सी’ ही बन जाए योग्यता का पैमाना!
ऐसा नहीं है कि इन नियुक्तियों की कानूनी वैधता पर कोई सीधा उंगली उठा रहा है, लेकिन सवाल उस संदेश का है जो आम जनता और बिहार के युवाओं के बीच जा रहा है। क्या बिहार में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ मेधावी होना काफी नहीं है, बल्कि ‘सही कनेक्शन’ होना ज्यादा जरूरी है?
आइए कुछ दिलचस्प मामलों पर नजर डालते हैं:
- संजय गांधी (MLC) का परिवार: जेडीयू के कद्दावर नेता और विधान पार्षद संजय गांधी की पत्नी की बहाली मगध विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले एस.एस. कॉलेज (जहानाबाद) में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हुई है। दिलचस्प बात यह है कि उनकी जन्मतिथि 1966 की है, यानी रिटायरमेंट में सिर्फ 5 साल बचे हैं। खुद संजय गांधी एमएलसी हैं, बेटा भी असिस्टेंट प्रोफेसर है और अब पत्नी भी इसी कतार में हैं।
- अशोक चौधरी (मंत्री): बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री अशोक चौधरी का खुद असिस्टेंट प्रोफेसर की रेस में आना भी खूब सुर्खियां बटोर रहा है। याद रहे कि उनकी बेटी शांभवी चौधरी समस्तीपुर से सांसद हैं।
- बड़े चेहरों की नई लिस्ट: पटना के प्रमुख कॉलेजों में जिन नामों की चर्चा है, उनमें शामिल हैं:
- प्रो. रत्ना अमृत – ए.एन. कॉलेज, पटना
- प्रो. रेखा रानी – अरविंद महिला कॉलेज, पटना
- प्रो. सुनीत राय – कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना
- प्रो. विजय लक्ष्मी – एम.एम. कॉलेज, विक्रम
- प्रो. श्यामा राय – गंगा देवी महिला कॉलेज, पटना
- प्रो. दिवाकर प्रसाद – बी.डी. कॉलेज, पटना
“जनता जपे नाम… नेता करें काम!”
इस पूरी तस्वीर का सबसे स्याह पहलू यह है कि बिहार का आम युवा आज भी एक अदद अदालती तारीख, रिजल्ट और वैकेंसी के लिए लाठियां खा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर पटना की सड़कों पर एक ही सवाल तैर रहा है—“अगर हर मलाईदार पद पर आईएएस, रसूखदार पत्रकारों और नेताओं के बाल-बच्चे और पत्नियां सेट हो जाएंगे, तो आम घरों के प्रतिभावान छात्रों के लिए जगह कहां बचेगी?”
कड़वा सच: “बिहार की जनता अगड़ा-पिछड़ा, हिंदू-मुसलमान और जातिवाद के नाम पर वोट देती रहे, रैलियों में नेताओं के लिए दरियां बिछाती रहे, माला पहनाती रहे… और उनके अपने बच्चे भविष्य के अंधकार में ढकेले जाते रहें। टैक्स आम आदमी भरेगा और मलाई सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग खाएंगे।”
भगवान भरोसे बिहार की शिक्षा?
नालंदा और विक्रमशिला की धरती, जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का उजाला दिया, आज खुद अपनी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर आंसू बहा रही है। रिशु श्री प्रकरण से लेकर विधायकों-सांसदों के टिकट बंटवारे और अब यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में अपनों को ‘एडजस्ट’ करने का यह खेल क्या बिहार को सशक्त बनाएगा?
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इस पर जवाब देना चाहिए कि आखिर इस व्यवस्था में बिहार के उस आम युवा की जगह कहाँ है जिसके माता-पिता अपना खून-पसीना जलाकर उसे पढ़ाते हैं, ताकि वह मजदूर बनने के लिए पलायन करने को मजबूर न हो।