समस्तीपुर/बिहार स्कैन
किताबों के पन्नों से बाहर निकलकर जब शिक्षा समाज को संवेदनशील बनाने का जरिया बनती है, तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई देती है। समस्तीपुर जिले के मोहनपुर स्थित यूएमएस कन्या दशहरा विद्यालय में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां बच्चों ने रंगों और कूची के जरिए एक बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय ‘डिस्लेक्सिया’ पर अपनी कला का शानदार प्रदर्शन किया।
इस अनूठी पेंटिंग प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य छात्रों में रचनात्मकता और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ समाज में डिस्लेक्सिया को लेकर एक सकारात्मक सोच विकसित करना था।
शिक्षिका की पहल और प्रधानाध्यापिका का मार्गदर्शन
इस प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन विद्यालय की शिक्षिका प्रतिभा तिवारी द्वारा किया गया, जबकि पूरी गतिविधि प्रधानाध्यापिका प्रतिभा कुमारी के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुई। विद्यालय प्रबंधन का यह प्रयास बच्चों के सर्वांगीण विकास और ‘समावेशी शिक्षा’ (Inclusive Education) को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम है।
प्रतियोगिता के दौरान बच्चों ने अपनी कल्पनाशीलता और भावनाओं को रंगों के माध्यम से कैनवास पर बखूबी उतारा।
क्या है डिस्लेक्सिया और क्यों जरूरी है यह संदेश?
आयोजकों ने इस दौरान बच्चों और अभिभावकों को समझाया कि डिस्लेक्सिया बच्चों में एक विशिष्ट अधिगम (Learning) कठिनाई है, जिसकी वजह से उन्हें पढ़ने, लिखने या शब्दों को पहचानने में परेशानी हो सकती है। हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि बच्चा कम बुद्धिमान या प्रतिभाहीन है। ऐसे बच्चों को सहानुभूति, धैर्य, सही मार्गदर्शन और एक सकारात्मक माहौल की सख्त जरूरत होती है।
समावेशी शिक्षा पर दिया गया जोर
कार्यक्रम के दौरान बिहार राज्य विद्यालय अध्यापक संघ के समस्तीपुर जिला अध्यक्ष मो. शाहिद का संदर्भ भी बेहद खास रहा। इस मौके पर शिक्षा को अधिक समावेशी बनाने, शिक्षकों को प्रेरित करने और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक अनुकूल शैक्षणिक माहौल तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया।
यह आयोजन समाज को यह आईना दिखाता है कि शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम और नंबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर बच्चे के भीतर छिपी हुई खूबी को पहचानकर उसे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाना ही सच्ची शिक्षा है।