पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान टकराव के बीच दुनिया की निगाहें अब भारत पर टिक गई हैं। इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio अपने चार दिवसीय आधिकारिक दौरे पर भारत पहुंच चुके हैं। विदेश मंत्री बनने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा है, जिसे वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
भारत पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने प्रधानमंत्री Narendra Modi से मुलाकात की। इस हाई-लेवल बैठक में रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, इंडो-पैसिफिक रणनीति और मिडिल ईस्ट संकट जैसे कई बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। सबसे बड़ी बात यह रही कि रुबियो ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की ओर से पीएम मोदी को आधिकारिक तौर पर व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण सौंपा।

भारत-अमेरिका रिश्तों में फिर बढ़ी गर्मजोशी
पिछले कुछ महीनों में व्यापार शुल्क, वीजा नियमों और तेल खरीद जैसे मुद्दों को लेकर भारत और अमेरिका के रिश्तों में हल्की तल्खी देखी जा रही थी। लेकिन रुबियो की इस यात्रा ने साफ संकेत दे दिया है कि वॉशिंगटन भारत को अपने सबसे अहम रणनीतिक साझेदारों में मानता है।
करीब एक घंटे चली बैठक के बाद दोनों देशों ने रक्षा, टेक्नोलॉजी और वैश्विक सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। पीएम मोदी ने भी मुलाकात की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी आने वाले समय में और मजबूत होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस समय चीन को संतुलित करने के लिए भारत के साथ अपने रिश्तों को नई ऊंचाई देना चाहता है। खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका अब पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई है।
मिडिल ईस्ट संकट और भारत की चिंता
रुबियो की इस यात्रा का सबसे बड़ा एजेंडा पश्चिम एशिया में जारी तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरा मंडरा रहा है। यही वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से को कच्चे तेल की सप्लाई होती है।
भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अगर हालात बिगड़ते हैं तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है, जिसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
सूत्रों के मुताबिक, मार्को रुबियो ने पीएम मोदी को भरोसा दिलाया है कि अमेरिका भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर है और वैकल्पिक तेल सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
क्या मिडिल ईस्ट में मध्यस्थ बनेगा भारत?
भारत के संबंध ईरान, सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ लंबे समय से संतुलित रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका चाहता है कि भारत इस संकट को शांत कराने में अहम भूमिका निभाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा दौर में भारत उन गिने-चुने देशों में है, जिनके संबंध पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत हैं और मध्य पूर्व के देशों के साथ भी भरोसेमंद बने हुए हैं। ऐसे में भारत एक प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
व्यापारिक तनाव खत्म करने की कोशिश
रुबियो का यह दौरा केवल रणनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले साल अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने के बाद दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में तनाव पैदा हो गया था।
इसके अलावा अमेरिकी वीजा नियमों की सख्ती से भारतीय आईटी सेक्टर भी प्रभावित हुआ था। हालांकि अब अमेरिका रिश्तों में आई दूरी को कम करने की कोशिश करता दिख रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत के तेजी से बढ़ते बाजार और चीन पर निर्भरता कम करने की अमेरिकी रणनीति के चलते वॉशिंगटन भारत के साथ संबंध खराब करने का जोखिम नहीं लेना चाहता।
QUAD बैठक पर भी दुनिया की नजर
मार्को रुबियो की यात्रा के दौरान नई दिल्ली में होने वाली क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी बेहद अहम मानी जा रही है। इस बैठक में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।
क्वाड का मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है। माना जा रहा है कि इस बैठक में समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और नई तकनीक पर बड़े फैसले हो सकते हैं।
कोलकाता जाकर मदर टेरेसा को दी श्रद्धांजलि
दिलचस्प बात यह रही कि भारत दौरे की शुरुआत में मार्को रुबियो सबसे पहले कोलकाता पहुंचे। वहां उन्होंने Mother Teresa के मदर हाउस जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
करीब 14 साल बाद किसी अमेरिकी विदेश मंत्री का यह पहला कोलकाता दौरा रहा। इसे भारत के साथ सांस्कृतिक और मानवीय रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
निष्कर्ष
मार्को रुबियो का भारत दौरा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट और बदलती वैश्विक राजनीति के दौर से गुजर रही है।
पीएम मोदी को मिला व्हाइट हाउस का निमंत्रण साफ संकेत देता है कि अमेरिका भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में देख रहा है। आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।