मुजफ्फरपुर/बिहार स्कैन
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पंचायती राज विभाग के तहत चल रही तकनीकी सहायक (Technical Assistant) के पदों की बहाली प्रक्रिया में फर्जीवाड़े का एक बड़ा खेल बेनकाब हुआ है। अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों के आधार पर हो रहे इस चयन में धड़ल्ले से फर्जी पॉलिटेक्निक (डिप्लोमा) डिग्रियों का इस्तेमाल किया गया है। बिहार राज्य तकनीकी शिक्षा बोर्ड के उप परीक्षा नियंत्रक की आधिकारिक रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
सत्यापन के दौरान हुआ सनसनीखेज खुलासा नियमों के मुताबिक, चयनित अभ्यर्थियों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन संबंधित बोर्ड और विश्वविद्यालयों से कराया जाता है। जब इन दस्तावेजों को जांच के लिए भेजा गया, तब जाकर इस फर्जीवाड़े की परतें खुलीं।
अब तक की जांच में जिन मामलों का खुलासा हुआ है, वे बेहद चौंकाने वाले हैं:
-
बबलू कुमार: वर्ष 2013 का एक प्रमाणपत्र राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज, गयाजी के नाम पर जमा किया गया था, जो जांच में फर्जी निकला।
-
मोनिका कुमारी: वर्ष 2021 का दूसरा प्रमाणपत्र राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज, भागलपुर के नाम पर है, जो पूरी तरह जाली पाया गया है। खास बात यह है कि इन दोनों फर्जी अंकपत्रों पर खुद को डिस्टिंक्शन के साथ प्रथम श्रेणी (First Class) में पास होना दर्शाया गया था ताकि चयन में कोई रुकावट न आए। इसके अलावा, दो अन्य अभ्यर्थियों के रोल नंबर और प्रमाणपत्र भी पूरी तरह अपठनीय पाए गए हैं, जिससे उनके भी फर्जी होने की प्रबल आशंका जताई जा रही है।
बड़ा सिंडिकेट सक्रिय होने की आशंका चूंकि यह बहाली पूरी तरह से एकेडमिक अंकों के आधार पर होनी है, ऐसे में उच्च प्राप्तांक वाले जाली दस्तावेज मिलने से यह अंदेशा जताया जा रहा है कि इसके पीछे कोई बड़ा संगठित रैकेट या सिंडिकेट सक्रिय है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उप परीक्षा नियंत्रक ने जिला पंचायती राज पदाधिकारी को आधिकारिक पत्र लिखकर इन फर्जी प्रमाणपत्र धारकों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कड़ी कानूनी कार्रवाई (FIR) करने का निर्देश दिया है। वहीं, जिला प्रशासन की ओर से एक अन्य संदिग्ध अंकपत्र के मामले में संबंधित अभ्यर्थी से स्पष्टीकरण (Show Cause) भी तलब किया गया है।
आपको बता दें कि इससे पहले स्वास्थ्य विभाग में एएनएम (ANM) की बहाली के दौरान भी फर्जी डिग्रियों का मामला सामने आ चुका है। एक के बाद एक आ रहे ऐसे मामलों ने सरकारी नौकरियों में दस्तावेजों के सत्यापन और सुरक्षा व्यवस्था पर फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।